ज़िंदगी

वक़्त से क़दम मिलाने थे, ये अरमान था कभी,
मगर पता ही न चला सफ़र बदल गया सभी।
चेहरा तो आगे बढ़ता गया रोशनी के साथ,
और बेचारे क़दम पीछे रह गये थक कर हर बार।

चेहरे को मेक-अप का सहारा मिलता गया,
झूठी चमक में हर आईना सजता गया।
तालियाँ भी मिलीं, महफ़िलें भी साथ रहीं,
पर क़दम थे कि ख़ामोशी में अकेले चलते रहे कहीं।

बदन पर फिर महंगे लिबास आने लगे,
रुतबे के नए किस्से ज़माने गाने लगे।
हर रंग, हर कपड़ा शान बनता गया,
मगर क़दमों का सफ़र और सूना होता गया।

ऊँची इमारतों में नाम लिखते रहे,
ख़्वाहिशों के पीछे उम्र सिलते रहे।
चेहरे की मुस्कान सबको दिखाई दी,
पर क़दमों की थकान किसी को सुनाई न दी।

एक दिन यूँ ही नज़र नीचे झुक गई,
धूल में अपनी ही परछाईं दिख गई।
तब एहसास हुआ इस भागती हुई दुनिया में,
दिखावे की चमक ने कितना लूटा मुझे चुपके से।

मैं चेहरों को सजाता रहा उम्र भर,
पर अपनी रूह को देता रहा अधूरा सफ़र।
और जब क़दमों से पूछा — “तुम इतने ख़ामोश क्यों हो?”
उन्होंने हँसकर कहा,
“तू दुनिया बनाता रहा…
और खुद को ही भूल गया।”

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    The day your voice drifts into my night, I lose every reason left to write. You come and steal my words, my soul, Only to leave them at my door once more— for I am no longer yours.

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